वोट बैंक की राजनीति से कुछ अलग

वोट बैंक की राजनीति से कुछ अलग



राघवेंद्र प्रसाद मिश्र

केंद्र सरकार ने हाल में हज सब्सिडी को बंद करके देश की जनता को यह संदेश दे दिया है कि पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा चलाई जा रही वह योजनाएं जिनका मौजूदा समय में औचित्य नहीं रह गया है उन्हें अब बंद कर दिया जाएगा। आजादी के बाद से दलितों व मुस्लिमों के उत्थान व विकास को लेकर खूब राजनीति हुई। इतना ही नहीं इनके नाम पर कई राजनीतिक दल अस्तित्व में आए भी और अपने प्रभुत्व वाले राज्यों में सत्ता पर काबिज भी हुए। लेकिन आलम यह रहा कि पिछड़ी, दलित, शोषित व अल्पसंख्यक की राजनीति करने वाले ऐसे लोग विकास की दिशा में भले ही कोई कारगर कदम न उठा पाए हों, पर देखते ही देखते अकूत संपत्ति के मालिक जरूर बन बैठे। सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने सब्सिडी के नाम पर सरकारी धन के नुकसान की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए लोगों से अपील की कि सक्षम लोग गैस पर मिलने वाली सब्सिडी को लेना बंद कर दें। प्रधानमंत्री की इस अपील का असर देश के कुछ लोगों पर हुआ भी और उन लोगों ने गैस सब्सिडी लेना बंद भी कर दिया। उनको लगा कि सब्सिडी के नाम पर वो गरीबों का हक मार रहे हैं।

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हज सब्सिडी खत्म किए जाने पर विपक्षी दलों ने इसकी निंदा शुरू कर दी शायद उनको यह लगने लगा था कि इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया जा सकता है। लेकिन केंद्र सरकार ने हज सब्सिडी के तहत मिलने वाले पैसों को मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा पर खर्च करने का प्रावधान करके उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया। केंद्र के इस फैसले का मुस्लिम समुदाय व संगठनों ने भी तारीफ करते हुए यह मांग की थी कि हज यात्रा के लिए एयर इंडिया की बाध्यता को खत्म किया जाए। इससे यह साफ हो गया कि मुस्लिम समाज हज सब्सिडी के पक्ष में कभी नहीं था। पर जाति-समुदाय की राजनीति करने वाले दलों ने इस बारे में सोचने की जहमत इसलिए नहीं उठाई क्योंकि उन्हें इस समुदाय के वोट बैंक के प्रभावित होने का डर था।

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मोदी सरकार ने ऐसे मिथक को तोडक़र यह साबित कर दिया कि पार्टी व देश की हालत दिखावे से नहीं कुछ कर गुजरने से बदलती है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 10 मई, 2012 में हज सब्सिडी को दस वर्षों में खत्म करने का आदेश दिया था। जस्टिस आफताब आलम की बेंच ने कुरान का हवाला देते कहा था कि सब्सिडी अल्पसंख्यकों को लुभाने जैसा है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के अनुसार सब्सिडी को 2022 तक खत्म किया जाना था पर मोदी सरकार ने इसे 16 जनवरी, 2018 को खत्म कर दिया। इस साल करीब 1.75 लाख लोग हज जाने वाले हैं। केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद अब इन लोगों को सब्सिडी का फायदा नहीं मिलेगा।

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भारतीय राजनीति में मुस्लिम समुदाय को लेकर काफी सियासत की गई। रजनीतिक दलों ने धर्म की आड़ में व्याप्त खामियों का भरपूर लाभ उठाया है। मोदी सरकार ने वोट बैंक की राजनीति को दरकिनार करते हुए मुस्लिम समुदाय पर 33 दिनों में तीन बड़े फैसले करके सबको भौचक्का कर दिया। 15 दिसंबर, 2017 को तीन तलाक के खिलाफ बिल को कैबिनेट से मंजूरी दिलाकर, 28 दिसंबर को लोकसभा में पास भी करा लिया। विपक्ष के विरोध के चलते यह बिल राज्यसभा में अटक गया है, जिसे 29 जनवरी से शुरू हो रहे बजट सत्र में फिर लाया जाएगा। इसी तरह 31 दिसंबर, 2017 को मोदी सरकार ने पुरुषों के बैगर महिलाओं को हज पर जाने की व्यवस्था दी। नई व्यवस्था के तहत 45 साल से ज्यादा उम्र की महिलाएं अब बिना पुरुष अभिभावक के हज पर जा सकेंगी। मंत्रालय से आवेदन करने वाली सभी 1300 महिलाओं को हज पर जाने की इजाजत मिल गई है।

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लालच बुरी बला है यह बात सबको पता है पर लालच मनुष्य के स्वभाव में शामिल है। एक दौर था जब व्यक्ति को यह लगता था कि कठिन परिश्रम से सफलता मिलेगी लेकिन आज के दौर में लोग कठिन परिश्रम की जगह शार्टकट के माध्यम से सब कुछ हासिल करने में यकीन करने लगे हैं। शायद यही वजह है कि आज अपराध का स्वरूप बदल गया है और वह काफी हद तक बढ़ भी गया है। समाज के उत्थान व विकास के लिए हमारी सरकारों ने तमाम योजनाएं चलाईं, जिससे मूलभूत सुविधाओं से वंचित तबके के लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके। इन योजनाओं का लाभ लोगों को मिल भी रहा है। लेकिन भ्रष्टतंत्र के चलते वास्तविक जरूरतमंद आज भी इन योजनाओं के लाभ से वंचित ही हैं।

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केंद्र में मोदी के नेतृत्व में आई भाजपा सरकार ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की दिशा में तमाम प्रयास किए है। और इसका असर दिख भी रहा है। योजनाओं को आधार से जोडक़र इसमें व्याप्त धांधलियां काफी हद तक नियंत्रित हो गई हैं। जो लोग अपनी पहुंच व पकड़ के चलते गरीबों का हक मार रहे थे। वह लोग अब ऐसा करने की साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। रिश्वतखोरी को रोकने के लिए भ्रष्टतंत्र पर अंकुश लगाना बेहद जरूरी है। जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी व कर्मचारी जब तक रिश्वतखोरी की अपनी मानसिकता में बदलाव नहीं लाएंगे, तब तक सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्तियों को मिल पाना टेढी खीर ही लगता है। हालात हकीकत से बदलता है और इस हकीकत को समझे बिना बदलाव की कल्पना करना बेमानी ही है। सरकारी योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर पर जरूरत मंद लोगों को कितना मिल रहा है इसको सुनिश्चित कराया जाना चाहिए।

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