कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाना कितना लाजिमी!

कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाना कितना लाजिमी!



राघवेंद्र प्रसाद मिश्र

समय व कालखंड के हिसाब से आधुनिक दौर में अपराध व इसके विरोध का स्वरूप भी बदल गया है। अपराधी कानून के पकड़ से बच निकलने के लिए देश के मौजूदा कानून में व्याप्त खामियों का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। हालांकि इसका सबसे ज्यादा फायदा उच्च पदस्थ नौकरशाह व राजनेता उठा रहे हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण हाल के दिनों में टू जी स्पेक्ट्रम व चारा घोटाले में आए फैसले हैं। जहां एक तरफ साक्ष्य के अभाव में टू जी स्पेक्ट्रम में सभी आरोपी बरी हो जाते हैं तो वहीं दूसरी ओर चारा घोटाले में सभी आरोपी आज सलाखों के पीछे पहुंच गए हैं। पर इन दोनों मामलों में कानून की निष्पक्षता पर सवाल जरूर उठे हैं। जबकि यह न्याय व्यवस्था के खिलाफ है पर जिस तरह से देश में कानून के साथ खिलवाड़ किया गया है ऐसी परिस्थिति में सवाल उठना लाजिमी भी है। ऐसे में सवाल यह भी है कि कानून की निष्पक्षता पर उंगली उठाने वाले क्या वह सच व सत्य का साथ दे रहे हैं। अगर ऐसा नहीं है तो उन्हें सवाल खड़े करने का कोई हक भी नहीं होना चाहिए।

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6 जनवरी, 2018 को चारा घोटाले से जुड़े एक मामले में रांची स्थित सीबीआई की विशेष अदालत ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व राजद सुप्रीमो सहित 16 लोगों को सजा सुनाई है। देवघर कोषागार से 89.04 लाख रुपए अवैध निकासी के मामले में अदालत ने लालू प्रसाद को साढ़े तीन वर्ष की सजा के साथ दस लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है। सीबीआई की विशेष अदालत ने 23 दिसंबर, 2017 को इस मामले से जुड़े लालू प्रसाद यादव सहित 16 अन्य लोगों को दोषी करार दिया था। अदालत की ओर से लालू प्रसाद यादव को दोषी ठहराए जाने के बाद से ही मामले में सियासत शुरू हो गई थी। लालू के बेटे तेजस्वी यादव सहित राजद के कई पदाधिकारियों व समर्थकों ने अदालत पर तरह-तरह के आरोप गढऩा शुरू कर दिया था, जिस पर अदालत ने तेजस्वी सहित कुछ लोगों को कोर्ट की अवमानना का नोटिस जारी करना पड़ा था। मौजूदा परिवेश में ऐसा वातावरण सृजित हो गया है कि राजनेताओं से संबंधित मामले में अगर फैसला आरोपी के हक में आता है तो सब कुछ ठीक है। अगर नहीं तो कोर्ट पर सरकार के दबाव में फैसला सुनाने का आरोप लगाना अब आम सी बात हो गई है। आरोप लगाने वाले यह भूल जाते हैं कि उनकी इस हरकत से अदालत की साख तो प्रभावित हो रही है साथ ही उनके इन आरोपों से उन लोगों को धक्का लग रहा है जो वर्षों से न्याय की आस लिए कोर्ट का चक्कर लगा रहे हैं। सजा सुनाए जाने के बाद नेताओं व रसूखदारों को जेल के अंदर कितनी और किस तरह की सुविधाएं मिल रही हैं यह किसी से छुपा नहीं है। बावजूद इसके आज भी आम आदमी को कोर्ट से ही उम्मीद नजर आती है। आज भी उसे लगता है कि कोर्ट से जरूर इंसाफ मिलेगा। सजा सुनाए जाने के तीसरे दिन ही लालू प्रसाद ने जिस तरह से यह ट्वीट किया कि ‘चोर होता तो भाजपा में होता, जेल में नहीं।’ ऐसे में इस बयान का क्या मतलब निकाला जाए? जबकि चारा घोटाले में ही लालू प्रसाद यादव के खिलाफ तीन मामलों में अभी सुनवाई चल रही है। ये मामले दुमका कोषागार से चार करोड़, चाईबासा से 36 करोड़ और डेरांडा कोषागार से 184 करोड़ रुपए की अवैध निकासी के हैं।

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चारा घोटाले से जुड़े पहले मामले में रांची स्थित सीबीआई की विशेष अदालत ने 30 सितंबर, 2013 को लालू प्रसाद यादव सहित 45 अभियुक्तों को दोषी ठहराया था। 3 अक्टूबर, 2013 को लालू प्रसाद को पांच साल की सजा सुनाई गई थी। दो माह दस दिन बाद लालू को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई थी। और तब से वह जेल से बाहर ही थे। लालू प्रसाद को जमानत मिलने पर उस समय भी भारतीय कानून व्यवस्था को लेकर तमाम तरह के सवाल उठे थे। लेकिन वह पक्ष खुश था जो अदालत के फैसले पर उंगली उठा रहा है। क्योंकि सब कुछ उनके हिसाब से हुआ था। पर उस वक्त वह आम आदमी हताश था जो न्याय पालिका की तरफ आज भी आशा भरी नजरों से देख रहा है।

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आप किसी फैसले से असंतुष्ट हैं तो उसके लिए भारतीय न्याय व्यवस्था में संवैधानिक रास्ते हैं। पर पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करना न तो न्याय के हक में है और न ही देश के। लालू प्रसाद आज अगर सलाखों के पीछे हैं तो इसके लिए उनका कर्म जिम्मेदार है। क्योंकि बिना आग के धुंआ नहीं उठता। एक समय था जब चारा घोटाले की बात सामने आई थी तो पूरा देश हतप्रभ था। और आज जब अदालत का फैसला आया है तो समर्थक अदालत के फैसले पर ऐसे सवाल कर रहे हैं जैसे किसी निर्दोष को सजा हो गई है।

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आज अगर अपराध बढ़ रहे हैं तो इसके लिए हम लोग ही जिम्मेदार हैं, जो यह भूल जाते हैं कि व्यक्ति का अपराध क्या है। हमें बस इतना याद रहता है कि वह मेरा कितना करीबी और भविष्य में इससे कितना लाभ मिल सकता है। इसी सोच के चलते आज ऐसे लोगों को पनाह मिल रही है, जिसे कभी हमारा समाज, अपने समाज से बाहर कर दिया करता था। अपराधियों को कानून से ज्यादा अपने करीबियों का डर सताता था कि उनकी किसी हरकत से उनके अपने न उनसे दूरी बना लें। आज पूरा वातावरण बदल चुका है। लोगों के अंदर से समाज का भय खत्म हो गया है। उन्हें यह लगने लगा कि वह कुछ भी करें। अपने दबाव-प्रभाव के चलते वह कानून से खेलते रहेंगे। ऐसा सोचने वालों को लालू प्रसाद यादव की सजा से सबक लेने की जरूरत है। क्योंकि जिस दिन अपराधी कानून के शिकंजे में आ जाएगा। उसकी सजा निश्चित है चाहे वह कितना दबाव-प्रभाव वाला क्यों न हो।

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