जीवन में समर्पण की भावना का पर्व है करवाचौथ

जीवन में समर्पण की भावना का पर्व है करवाचौथ

समाज में वैवाहिक सम्बध अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हुए महिला और पुरूष को आजीवन एक दूसरे से जोडे रखती है।


समाज में वैवाहिक सम्बध अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हुए महिला और पुरूष को आजीवन एक दूसरे से जोडे रखती है।

करवाचौथ

मन्दीप कुमार वर्मा

गोला गोकर्णनाथ खीरी। भारतीय समाज परम्परा और मान्यताओं के धागे में गुंथा हुआ, ऐसा समाज है,जिसमें व्यक्ति के लिए उसके संम्बध ज्यादा अहमियत रखते हैं। जिस कारण समाज में विधमान सभी परम्परायें, पारस्परिक और भावनात्मक संबधों को मजबूती प्रदान करती हुई प्रतीत होती चली आ रही हैं।

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रक्षा बंधन, भाई दूज, तीज, आदि त्योहार कुछ ऐसे पारस्परिक संबधों को भावनात्मक रूप से गहराई प्रदान करने के साथ साथ जीवन में परिवार की उपयोगिता को भी दर्शाता है। इन्हीं परमपराओं में से करवा चौथ का पर्व है, जिसका इंतजार प्रत्येक विवाहित स्त्री को पूरे वर्ष भर रहता है, परंपरा के अनुसार करवाचौथ के दिन हर विवाहिता अपने पति के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घ आयु की कामना करते हुए निर्जल उपवास रखती है और रात को चांद देखने के बाद वह अपने ब्रत को समाप्त करती है। समाज में वैवाहिक सम्बध अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हुए महिला और पुरूष को आजीवन एक दूसरे से जोडे रखती है। विवाह के पश्चात उनका जीवन व्यक्तिगत का ना होकर परस्पर सहयोग की भावना पर आधारित हो जाता है।

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वैवाहिक जीवन में दंपति सर्मपण की भावना को समेटे हुए अपने वैवाहिक जीवन को खुशहाल बनाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। भारतीय समाज अपने मौलिक रूप में एक पुरूष प्रधान समाज है, प्रारम्भिक काल से ही महिलाओं को पुरूष से अधिक सहनशील माना जाता है। आज की महिलायें पढी लिखी और स्वंत्रत है, वह अपना भला बुरा सोचने में पूरी तरह सक्षम हैं, फिर भी करवा चौथ जैसी संस्कृति को पूरी तरह अपनाती हैं। इसके पीछे साफ तौर पर पति के प्रति प्रेम छुपा होता है। आधुनिक परिवेश में पली बढी महिला जब विवाह के पश्चात करवा चौथ के रूप में पारिवारिक संस्कृति को सम्मान पूर्वक अपनाती है, तो चार चांद लग जाते हैं।

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