सरकारी स्कूलों में तो बस खाना, वर्दी और वजीफा मिलता है?

सरकारी स्कूलों में तो बस खाना, वर्दी और वजीफा मिलता है?



primary school
सर्व शिक्षा अभियान के तहत सरकारी स्कूलों की संख्या बढ़ी है, लेकिन सुधारों का सिलसिला थम सा गया है। (फाइल फोटो)

मंदीप वर्मा

गोला गोकर्णनाथ, खीरी। देश में शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए आए दिन दावे किए जा रहे हैं। शिक्षा का अधिकार, सर्व शिक्षा अभियान लागू किया गया, लेकिन प्राइमरी शिक्षा व्यवस्था में कोई सुधार नजर नहीं आ रहा है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुजर्खी भी शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठा चुके हैं। वहीं, पिछले साल इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि प्रदेश के सभी जनप्रतिनिधियों, सरकारी अफसरों और कर्मचारियों और जजों को अपने बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूलों (प्राथमिक विद्यालयों) में पढ़ाना होगा। कोर्ट ने कहा था कि जब तक इन लोगों के बच्चे सरकारी स्कूलों में अनिवार्य रूप से नहीं पढ़ेंगे, तब तक इन स्कूलों की हालत नहीं सुधरेगी। कोर्ट के इस आदेश को एक साल बीत चुका है लेकिन पूर्व की अखिलेश और योगी सरकार इस पर अमल नहीं करा सकी है।

लगातार फल-फूल रहे प्राइवेट स्कूल

प्राइवेट स्कूल लगातार फल-फूल रहे हैं, सरकारी स्कूल बेदम हैं। सर्व शिक्षा अभियान के तहत सरकारी स्कूलों की संख्या बढ़ी है, लेकिन सुधारों का सिलसिला थम सा गया है। सबसे बड़ी मुश्किल शिक्षकों की तैनाती को लेकर खड़ी हुई है। उनकी कमी पूरे देश में है। उत्तर प्रदेश की स्थिति को संवारना आसान नहीं है और सरकार की इच्छा शक्ति लंबे समय से कमज़ोर रही है। वहीं, सरकारी अनुदान से चलने वाले स्कूल पहले से ही उत्तर प्रदेश में काफी बड़ी संख्या में रहे हैं।

आज छोटे से छोटे गांव में प्राइमरी स्तर का सरकारी स्कूल है। उसके समानांतर गांव-गांव में अंग्रेज़ी माध्यम का दावा करने वाले प्राइवेट स्कूल खुल रहे हैं। सामाज में भी एक धारण बन गई है कि पढ़ाई इन्हीं में होती है। सरकारी स्कूल में तो बस खाना मिलता है, वर्दी और वजीफ़ा बंटता है। बच्चों के स्तर पर समाज का बंटवारा हो चुका है, जो भी थोड़ी बहुत हैसियत रखता है और फ़ीस दे सकता है, अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से हटा लेना चाहता है।

उत्तर प्रदेश में निर्धन मज़दूर और छोटे किसानों का वर्ग बहुत बड़ा है। इसलिए सरकारी स्कूलों में भी बच्चों की संख्या काफ़ी बढ़ी है। शिक्षा का अधिकार क़ानून आने के बाद से इन स्कूलों की इमारत और सुविधाएं भी सुधरी हैं, पर एक समस्या लगातार बनी रही है और इधर के सालों में विकराल रूप ली जा रही है। यह समस्या है शिक्षकों की कमी की। उत्तर प्रदेश की आम सच्चाई है कि गांव का सरकारी स्कूल एक दो शिक्षकों के सहारे चलता है और शहर के स्कूलों में जरूरत से ज़्यादा शिक्षक हैं।

तभी सुधरेगा शिक्षा का स्तर

गौर करने वाली बात है कि प्राइमरी स्कूल में जब अफ़सर, नेता और मज़दूर के बच्चे साथ-साथ पढ़ेंगे तो समाज का बंटवारा घटेगा, शिक्षा का स्तर भी सुधरेगा, छुटपन से अंग्रेज़ी थोपे जाने की समस्या भी सुलझेगी, शिक्षा का स्तर भी सुधरेगा। पर, इतनी बीमारियों का एक साथ इलाज़ सपने जैसे लगता है। अब देखना यह कि आखिर सरकार इस कानून को कब तक अमल में लाएगी या हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देगी।

हालांकि कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद यूपी आईएएस एसोसिएशन ने अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा था कि बच्चे की शिक्षा दिलाने का अधिकार उसके अभिभावक का है। वह अपने बच्चे को कहां और किस प्रकार के स्कूल में दाखिल कराता है, इसके कोई बाध्य नहीं कर सकता। एसोसिएशन ने कहा था कि अगर सरकार इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं गई तो आईएएस एसोसिएशन जाएगा।


You may also like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *