सुप्रीम कोर्ट से केंद्र को झटका, राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट से केंद्र को झटका, राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकार



supreme court in india

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने राइट टू प्राइवेसी यानि निजता का अधिकार को मौलिक अधिकार बताया है। इससे केंद्र सरकार को तगड़ा झटका लगा है। बता दें कि राइट टू प्राइवेसी मामले की नौ जजों की संविधान पीठ ने सुनवाई करते हुए फैसले को सुरक्षित रख लिया था। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को सार्वजनिक कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अब लोगों की निजी जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी। हालांकि आधार को योजनाओं से जोडऩे पर सुनवाई आधार बेंच करेगी। इसमें पांच जज होंगे।

1954 और 1962 के फैसले को पलट दिया

सुप्रीम कोर्ट ने 1954 में आठ जजों की संवैधानिक बेंच के एमपी शर्मा केस और 1962 में छह जजों की बेंच के खड्ग सिंह केस में दिए फैसले को पलट दिया। इन दोनों ही फैसलों में निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना गया था। हालांकि, ताजा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि निजता का अधिकार कुछ तर्कपूर्ण रोक के साथ ही मौलिक अधिकार है।

सरकार की महात्वाकांक्षी अधार कार्ड योजना पर  पड़ेगा असर

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से केंद्र सरकार को तगड़ा झटका लगा है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि निजता का अधिकार यानि राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकार नहीं है। इस फैसले का असर सीधे केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी अधार कार्ड योजना पर  पड़ेगा। साथ ही दूसरी अन्य योजनाओं पर भी पड़ेगा। हालांकि आधार कार्ड योजना के लिए पांच जजों की बेंच अलग से सुनवाई करेगी। वहीं, कुछ जानकारों का मानना है कि इस अधिकार के तहत सरकारी योजनाओं को चुनौती दी जा सकती है।

इन जजों ने की सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट की पीठ में मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर, जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस एआर बोबडे, जस्टिस आर के अग्रवाल, जस्टिस रोहिंग्टन नरीमन, जस्टिस अभय मनोगर स्प्रे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल हैं।

कौन हैं याचिकाकर्ता

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में कुल 21 याचिकाएं थीं। कोर्ट ने सात दिनों की सुनवाई के बाद दो अगस्त को फैसला सुरक्षित रख लिया था। कर्नाटक हाई कोर्ट के पूर्व जज केएस पुत्तास्वामी ने 2012 में आधार स्कीम को चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की। फिलहाल 91 साल के पुत्तास्वामी ने कहा था कि इस स्कीम से इंसान के निजता और समानता के मौलिक अधिकार का हनन होता है। याचिकाकर्ताओं में बी विल्सन, अरुणा रॉय और निखिल डे भी शामिल हैं।

याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण का बयान

याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण ने बताया कि कोर्ट ने राइट टू प्राइवेसी यानि निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना है। कोर्ट ने कहा है कि ये अनुच्छेद 21 के तहत आता है। हालांकि उन्होंने बताया कि कोर्ट ने आधार कार्ड को लेकर कोई फैसला नहीं लिया है। आधार कार्ड मामला पांच जजों की आधार बेंच के पास भेजा गया है। उन्होंने बताया कि अगर सरकारी योजनाओं रेलवे और एयरलाइन रिजर्वेशन के लिए भी जानकारी मांगी जाती है तो नागरिक की निजता का अधिकार माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट में जजों ने कहा
  • अगर मैं अपनी पत्नी के साथ बेडरूम में हूं तो यह प्राइवेसी का हिस्सा है। ऐसे में पुलिस मेरे बेडरूम में नहीं घुस सकती। हालांकि अगर मैं बच्चों को स्कूल भेजता हूं तो ये प्राइवेसी के तहत नहीं आता है, क्योंकि यह राइट टु एजूकेशन का मामला है।
  • कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि आप बैंक को अपनी जानकारी देते हैं। मेडिकल इंश्योरेंस और लोन के लिए अपना डाटा देते हैं। यह सब कानून द्वारा संचालित होता है। यहां बात अधिकार की नहीं है।
  • आज डिजिटल जमाने में डाटा प्रोटेक्शन बड़ा मुद्दा है। सरकार को डाटा प्रोटेक्शन के लिए कानून लाने का अधिकार है।
  • मैं जज के तौर पर बाजार जाता हूं और आप वकील के तौर पर मॉल जाते हैं। टैक्सी एग्रीगेटर इस सूचना का इस्तेमाल करते हैं।
  • राइट टु प्राइवेसी भी अपने आप में संपूर्ण नहीं है।
  • सरकार को वाजिब प्रतिबंध लगाने से रोका भी नहीं जा सकता है।
  • क्या केंद्र के पास आधार के डेटा को प्रोटेक्ट करने के लिए कोई मजबूत मैकेनिज्म है?
  • विचार करने की बात यह है कि मेरे टेलीफोन या ईमेल को सर्विस प्रोवाइडर्स के साथ शेयर क्यों किया जाए?
  • मेरे टेलिफोन पर कॉल आती हैं तो विज्ञापन भी आते हैं। तो मेरा मोबाइल नंबर सर्विस प्रोवाइडर्स से क्यों शेयर किया जाना चाहिए।
  • हम जानते हैं कि सरकार कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार का डाटा जमा कर रहा है, लेकिन यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि डाटा सुरक्षित रहे।
  • क्या कोर्ट प्राइवेसी की व्याख्या कर सकता है? आप यही कैटलॉग नहीं बना सकते कि किन तत्वों से मिलकर प्राइवेसी बनती है।
  • प्राइवेसी का आकार इतना बड़ा है कि ये हर मुद्दे में शामिल हैं। अगर हम प्राइवेसी को सूचीबद्ध करने का प्रयास करेंगे तो इसके विनाशकारी परिणाम होंगे।
केंद्र सरकार की दलील
  • अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने दलील दी कि प्राइवेसी को पूरी तरह मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता, हालांकि कोर्ट को प्राइवेसी का वर्गीकरण करना चाहिए और इसके कुछ हिस्सों को मौलिक अधिकारों के तहत सरंक्षण दिया जा सकता हैद्घ
  • एएसजी तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि यह डेटा पूरी तरह प्रोटेक्टेड है।
  • डेटा प्रोटेक्शन को लेकर सरकार कानून ला रही है और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के जज की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई है।

You may also like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *