मध्य प्रदेश: क्या कमलनाथ सरकार को बचा सकता है हरीश रावत का दांव?

मध्य प्रदेश: क्या कमलनाथ सरकार को बचा सकता है हरीश रावत का दांव?

मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार को बचाने के लिए कांग्रेस के नेता हर संभव कोशिश कर रहे हैं। राज्यपाल लालजी टंडन के दो बार कहने के बावजूद भी फ्लोर टेस्ट नहीं किया गया है


मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार को बचाने के लिए कांग्रेस के नेता हर संभव कोशिश कर रहे हैं। राज्यपाल लालजी टंडन के दो बार कहने के बावजूद भी फ्लोर टेस्ट नहीं किया गया है

New Delhi. मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार को बचाने के लिए कांग्रेस के नेता हर संभव कोशिश कर रहे हैं। राज्यपाल लालजी टंडन के दो बार कहने के बावजूद भी फ्लोर टेस्ट नहीं किया गया है। विधानसभा स्पीकर ने कोरोना वायरस के चलते इस कार्यवाही को 26 मार्च तक स्थगित कर दिया है। बीजेपी इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। मंगलवार को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सीएम कमलनाथ और विधानसभा सचिव को नोटिस जारी किया है और साथ ही कहा है कि नोटिस की कॉपी बागी विधायकों तक भी पहुंचा दिया जाए। आज इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में फिर अहम सुनवाई होनी है। उधर कांग्रेस के विधायकों को वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत की देखरेख में रखा गया है।

जयपुर से वही सभी कांग्रेस विधायकों को भोपाल लेकर आए थे। दरअसल यहां सरकार बचाने का एक तरीका उत्तराखंड के पूर्व सीएम हरीश रावत वाला भी है। एक बार उनके खिलाफ भी उत्तराखंड के कांग्रेस विधायकों ने बगावत कर दी थी। पूर्व सीएम विजय बहुगुणा, हरक सिंह रावत जैसे बड़े नेताओं ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था। ये मामला भी कोर्ट पहुंचा था, लेकिन हरीश रावत ने सभी विधायकों की विधानसभा सदस्यता रद्द करवा दी थी और बाकी बचे विधायकों की संख्या के आधार बहुमत साबित कर दिया था। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या सीएम कमलनाथ को हरीश रावत के अनुभव फायदा मिलता है या नहीं। वहीं हरीश रावत का भी कहना है कि मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार को कोई खतरा नहीं है।

दरअसल यह मामला संवैधानिक तकनीकी से जुड़ा है। उत्तराखंड में बागी विधायकों ने बीजेपी ज्वाइन कर ली थी। इसके बाद हरीश रावत को दलबदल कानून का सहारा मिल गया था, लेकिन मध्य प्रदेश में बागी विधायकों ने अभी बीजेपी ज्वाइन नहीं की है। इसलिए उनके ऊपर दलबदल कानून लागू नहीं होता है। राजनीतिक दांवपेंच का इस्तेमाल करके अगर सीएम कमलनाथ इन विधायकों सदस्यता रद्द करवा सकते हैं तो फिर मामला उत्तराखंड जैसा हो सकता है। बता दें कि कानूनविदों के मुताबिक राज्यपाल स्पीकर को आदेश नहीं दे सकता है और सदन में स्पीकर को अपने विवेक से फैसला लेने का अधिकार है।

बता दें कि मध्य प्रदेश विधानसभा में विधायकों के इस्तीफे से पहले 227 विधायक (2 का निधन और एक BSP विधायक सस्पेंड) कांग्रेस 114+6 सहयोगी मिलाकर 120 हैं और बीजेपी के पास 107, लेकिन 21 विधायकों के इस्तीफे के बाद कुल (इनमें से सिर्फ 6 के इस्तीफे अभी स्वीकार हुए हैं) विधायक 206, बहुमत का नया आंकड़ा 104, कांग्रेस+सहयोगी मिलाकर 99 यानी बहुमत से 5 कम। बीजेपी के पास 107 विधायक यानी बहुमत से 3 ज्यादा। मतलब ऐसी स्थिति में लड़ाई बहुत ही नजदीकी हो जाएगी। और जैसा कि कांग्रेस नेता दावा कर रहे हैं कि उनके संपर्क में भी बीजेपी के चार-पांच विधायक हैं तो शायद हरीश रावत की तरह कमलनाथ सरकार बचाने में कामयाब हो जाएं।

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