क्या अपने पूर्वजों की इस सीट को बरकरार रख पाएंगी डॉ. पूर्वी वर्मा, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

क्या अपने पूर्वजों की इस सीट को बरकरार रख पाएंगी डॉ. पूर्वी वर्मा, पढ़ें पूरी रिपोर्ट



Lucknow. प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 130 किमी. की दूरी पर स्थित लखीमपुर जिले की खीरी लोकसभा सीट पर मुकाबला हमेशा रोचक रहा है। वर्तमान में इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है, यहां अजय मिश्र टैनी सांसद है, लेकिन क्या इस बार ये सीट किसी और पार्टी के खाते में रहेगी या भाजपा का ही कब्जा बरकरार रहेगा। आइये जानते हैं क्या है खीरी लोकसभा सीट का रोचक इतिहास।

देश में आजादी के बाद से खीरी सीट पर पहली बार 1957 में लोकसभा चुनाव हुए। पहली बार इस सीट से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के कुशवक्त राय ने जीत हासिल की थी। हालांकि इसके बाद से लेकर अब तक कुल 16 बार इस सीट पर चुनाव हुए, जिसमें से आठ बार अकेले कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की है।

कांग्रेस से बाल गोविंद वर्मा ने 1962, 1967 और 1971 में जीत दर्ज की, लेकिन आपातकाल के बाद 1977 में जब चुनाव हुए तो कांग्रेस को यहां से नुकसान उठाना पड़ा और भारतीय लोकदल के उम्मीदवार सूरथ बहादुर शाह ने जीत दर्ज की। हालांकि इसके बाद 1980 में हुए चुनावों में बालगोविंद वर्मा एक बार फिर जीत हासिल कर संसद पहुंचे।

चुनाव के कुछ दिनों बाद ही 13 जनवरी 1980 को उनका निधन हो गया। इसके बाद उपचुनाव हुए, जिसमें उनकी पत्नी ऊषा वर्मा ने कांग्रेस के ही टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल कर संसद पहुंची। 1980 के बाद लगातार 1984 और 1989 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने जबरदस्त जीत हासिल की।

इसके बाद देश में राम मंदिर को लेकर आंदोलन तेज हुआ, जिसने भारतीय जनता पार्टी को काफी फायदा पहुंचाया। 1991 में हुए चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार गेंदन लाल कनौजिया ने जीत हासिल की। इसके बाद 1996 के चुनावों में भी उन्होंने जीत दर्ज की। हालांकि, मंदिर आंदोलन के बाद ही वर्चस्व में आई समाजवादी पार्टी ने भाजपा को अगले ही चुनाव में करारी मात दी।

1998, 1999 और 2000 के चुनाव में समाजवादी पार्टी यहां से लगातार तीन बार चुनाव जीती। हालांकि सबसे खास बात ये रही कि बाल गोविंद वर्मा और ऊषा वर्मा के बेटे रवि प्रकाश वर्मा ने ही इन चुनावों में जीत हासिल की, लेकिन 2009 के चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार जफर अली नकवी के खाते में ये सीट चली गई है। 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी लहर के चलते भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार अजय मिश्र टैनी ने जीत दर्ज की।

अब 2019 के लोकसभा चुनावों में इस सीट पर काफी रोचक मुकाबला होने का अंदेशा लगाया जा रहा है, क्योंकि आजादी के बाद से इस सीट पर कांग्रेस का सबसे ज्यादा दबदबा रहा है। हालांकि सबसे गौर करने वाली बात है कि इस सीट पर 16 बार हुए लोकसभा चुनावों में 10 बार सिर्फ एक ही परिवार का कब्जा रहा है।

बाल गोविंद वर्मा, ऊषा वर्मा, राज्यसभा सांसद रवि प्रकाश वर्मा के बाद अब उनकी बेटी डॉ. पूर्वी वर्मा इस चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन प्रत्याशी के रूप में अपनी किस्मत आजमाएंगी। ऐसे में अब देखना होगा कि क्या पूर्वी वर्मा अपने पूर्वजों की इस सीट को बरकरार रख पाएंगी या कांग्रेस अपना इतिहास दोहराएगी।

वहीं, खीरी की अगर आबादी को देखें तो यहां करीब 20 फीसदी मतदाता मुस्लिम समुदाय से हैं। 2014 के आंकड़ों के अनुसार, इस सीट पर कुल 17 लाख वोटर हैं, जिसमें से 9 लाख वोटर पुरुष और 7 लाख से अधिक महिला मतदाता हैं। अब ऐसे में सपा और बसपा को मुस्लिमों का समर्थन मिला था तो गठबंधन प्रत्याशी पूर्वी वर्मा को हराना कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा।

हालांकि अगर पिछले लोकसभा चुनाव की बात की जाए तो भाजपा और बसपा के बीच कड़ा मुकाबला हुआ था। बीजेपी को करीब 37 फीसदी वोट मिले थे, जबकि बसपा को 27 फीसदी वोट मिले थे। वहीं, कांग्रेस तीसरे और सपा चौथे स्थान पर थी।


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