गोरखप़ुर ‘नरसंहार’: संवेदनहीनता की इंतेहा

गोरखप़ुर ‘नरसंहार’: संवेदनहीनता की इंतेहा



निर्मल रानी

हालांकि पिछले वर्षों की भांति इस वर्ष भी स्वतंत्रता दिवस समारोह पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया तथा जन्माष्टमी जैसा महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मना। परंतु इन दोनों ही महत्वपूर्ण ‘पर्वों’ पर इस बार गोरखपुर में हुई साठ से अधिक लोगों की असामयिक मौत का साया मंडराते हुए साफतौर पर देखा गया। इन मृतक लोगों में अधिकांश संख्या बच्चों की थी। हालांकि कुपोषण,गरीबी,कालाज़ार,जापानी बुखार तथा इंसेफ़लाईटिस जैसे रोगों से भारत में बच्चों की मौत होने का सिलसिला कोई नया नहीं है। निश्चित रूप से यह इस देश का दुर्भाग्य है कि अंतरिक्ष में छलांगे लगाने तथा देश की धरती पर बुलेट ट्रेन दौड़ाने की योजनाएं चलाने वाला हमारा देश अभी तक बच्चों के जीवन तथा उनके स्वास्थय की गारंटी नहीं दे सका है। परंतु इस बार गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में 60 से अधिक लोगों की मौत का जो मामला सामने आया है वह अपने-आप में पिछले वर्षों में हुई मौतों से अलग इसलिए है कि यह मौतें बीमारी से होने के बजाए केवल इसलिए हुईं कि अस्पताल में कथित रूप से ऑक्सीजन के सिलेंडर की आपूर्ति करने वाली कंपनी द्वारा उसका बक़ाया भुगतान न होने के चलते ऑक्सीजन की आपूर्ति रोक दी गई थी।

गोरखपुर हादसे की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने के बावजूद पार्टी के ही एक मुखर सांसद साक्षी महाराज ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि ‘गोरखपुर के बीआरडी मोडिकल कॉलेज में हुई मासूमों की मौत केवल मौत नहीं बल्कि यह एक नरसंहार है’। उनके अनुसार ‘एक और दो मौतें तो सामान्य मौतें होती हैं परंतु इतने लोग एक साथ सामान्य मौत से नहीं मरते’। इस हादसे पर नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने भी अपनी प्रतिक्रिया देते हुए बच्चों की मौत को हादसा नहीं बल्कि ‘नरसंहार’ बताया है। सत्यार्थी ने यह भी सवाल किया कि हमारे बच्चों के लिए आज़ादी के सत्तर वर्षों का क्या यही मतलब है? बहरहाल प्रतिक्रियाएं जो भी हो पक्ष या विपक्ष जिसपर भी आरोप-प्रत्यारोप करें पंरतु जिन मांओं ने अपने मासूमों को सरकारी लापरवाही के चलते खोया है वे सरकार को इस लापरवाही के लिए कभी माफ नहीं कर सकेंगी। इस संदर्भ में एक और सबसे बड़ा विषय मामले से जुड़ी संवेदनहीनता का है। जोकि हादसे के दौरान राजनेताओं द्वारा दिखाई गई। जिस हादसे को बुद्धिजीवी तथा स्वयं भाजपाई नेता नरसंहार तक का नाम दे रहे हों उस हादसे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए राज्य के स्वास्थय मंत्री जिनसे कि प्रदेश की जनता त्यागपत्र की उम्मीद कर रही थी उन्होंने फरमाया कि हर साल अगस्त के महीने में बच्चों की मौत होती ही है। अपनी इस बात के समर्थन में मंत्री महोदय ने कुछ पिछले रिकॉर्ड भी खंगाल डाले। एक ओर तो मृतकों के परिजन अपने-अपने मासूमों की मौत के लिए ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित होने की गुहार लगाते रहे तो दूसरी ओर यही मंत्री महोदय यह कहते सुने गए कि इस घटना में बच्चों की मौत अलग-अलग कारणों से हुई है। यह ऑक्सीजन सप्लाई का मुद्दा नहीं है।

उधर मौत की आग़ोश में समा चुके बच्चों के परिजन शोकाकुल वातावरण में अपने दु:खों को भुलाने की कोशिश कर रहे थे और अपने बच्चों के संस्कार में लगे हुए थे कि इसी बीच राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस हादसे के संबंध में मीडिया से रूबरू  होकर अपनी कारगुज़ारियों का ब्यौरा पेश किया। मीडिया के समक्ष भावुक होकर अपनी संवेदना का अंदाज़ा कराया,प्रधानमंत्री की चिंताओं से अवगत कराया,केंद्रीय स्वास्थय मंत्री से लेकर अपने राज्य के मंत्रियों के इस संबंध में होने वाले गोरखपुर के दौरों की जानकारी दी। और एक बार तो मुख्यमंत्री ने यह मानने से भी इंकार कर दिया कि यह मौतें ऑक्सीजन की कमी की वजह से हुई हैं। परंतु उस समय पूरे प्रदेश बल्कि पूरे देश को बड़ा आश्चर्य हुआ जब मुख्यमंत्री योगी ने उसी दिन उत्तर प्रदेश के पुलिस प्रमुख को यह निर्देश जारी किया कि-‘जन्माष्टमी अत्यंत महत्वपूर्ण त्यौहार है इसे पुलिस विभाग अच्छे ढंग से मनाए। ज़रा सोचिए कि जो परिजन अपने-अपने ‘कन्हैया’ को गोरखपुर हादसे में गवा चुके होंगे उनपर मुख्यमंत्री की इस अपील का क्या असर हुआ होगा? उधर 15 अगस्त को लाल िकले की प्राचीर से भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोरखुपर त्रासदी का जि़क्र तो किया परंतु इसके लिए बहुत ही कम तथा हल्के शब्दों का प्रयोग किया। उन्होंने गोरखपुर से पहले प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान की चर्चा की बाद में बच्चों की मौत पर अफसोस ज़ाहिर किया। देश प्रधानमंत्री की इस संवेदनहीनता के लिए भी आश्चर्यचकित है कि उन्होंने गोरखपुर हादसे को लेकर तो तत्काल कोई ट्वीट नहीं किया जबकि नितीश कुमार द्वारा लालू यादव से रिश्ता तोडऩे की खबर आने के चंद मिनटों के भीतर ही उन्होंने नितीश कुमार को बधाई देने वाला ट्वीट कर दिया था। इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश में पिछले दिनों हुए बस हादसे पर भी प्रधानमंत्री ने तुरंत अपनी संवेदना जता दी थी। क्या प्रधानमंत्री की गोरखपुर हादसे पर लंबी खामोशी इस बात का सुबूत नहीं कि चूंकि उत्तर प्रदेश भाजपा शासित राज्य है इसलिए वे इस हादसे के बारे में कुछ अधिक बोलकर प्रदेश की योगी सरकार की अधिक किरकिरी करना नहीं चाहते?

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी गोरखपुर नरंसहार को यह कहते हुए ज़्यादा अहमियत नहीं दी कि भारत जैसे बड़े देश में बहुत सारे हादसे हुए है। यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। कांग्रेस के कार्यकाल में भी हादसे हुए हैं। इस प्रकार की संवेदनहीन बयानबाजि़यों तथा गैरजि़म्मेदाराना वक्तव्यों के बाद यह सवाल तो उठता ही है कि खुदा न ख्वास्ता इस प्रकार का कोई हादसा किसी गैर भाजपा शासित राज्य में हुआ होता तो उस समय क्या प्रधानमंत्री, भाजपा अध्यक्ष तथा उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के बयान इसी स्वर के होते? आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान ने तो अपने एक ट्वीट में यहां तक कह डाला कि यदि यह घटना दिल्ली के किसी अस्पताल में होती तो मोदी जी के हुक्म पर दिल्ली के मुख्यमंत्री के घर पर सीबीआई का छापा पड़ जाता और स्वास्थय मंत्री गिरफ्तार हो जाते। और इन सब पक्ष-विपक्ष की बयानबाजि़यों से अलग इससे भी बड़ी संवेदनहीनता तो इस विषय को लेकर रही कि बावजूद इसके कि इस अस्पताल में आक्सीजन की आपूर्ति करने वाली कंपनी ने लिखित रूप से अस्पताल को यह नोटिस दे दी थी कि निर्धारित समय सीमा के भीतर यदि उसकी बक़ाया धनराशि का भुगतान जोकि लगभग 69 लाख रुपये बताया जा रहा है, नहीं हुआ तो कंपनी ऑक्सीजन की सप्लाई रोक देगी। परंतु न जाने क्यों सरकार द्वारा तथा सरकार का इशारा पाकर अस्पताल प्रशासन द्वारा भी बार-बार यह कहा जाने लगा कि बच्चों की मौतों की वजह ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित होना नहीं है।

राज्य सरकार व अस्पताल प्रशासन द्वारा ऑक्सीजन की आपूर्ति से इंकार करने का मात्र एक ही कारण नज़र आता है कि वह कंपनी को भुगतान में देरी करने जैसी अपनी जि़म्मेदारी से पीछा छुड़ाना चाह रहे हैं। और लगभग प्रत्येक वर्ष इसेफ्लाईटेस जैसे रोग से पूर्वांचल के इस इलाके में होने वाली मौतों से इस हादसे को भी जोड़ देना चाहते हैं। परिस्थितियां जो भी हों परंतु इस प्रकार की बयानबाज़ी अथवा सरकार की नाकामियों पर पर्दा डालने की कोशिशों से बच्चों की जान तो वापस नहीं आ सकती। हां इतना ज़रूर है कि इस विषय पर जि़म्मेदार राजनेताओं के संवेदनहीन कदम व बयान मृतक बच्चों के मां-बाप के ज़ख्मों पर नमक-मिर्च छिडक़ने का काम ज़रूर करेंगे।

 ( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। उपुर्यक्त लेख लेखक के निजी विचार हैं। आवश्यक नहीं है कि इन विचारों से युगभारत.कॉम भी सहमत हो। )


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