मुश्किल में फंसे अखिलेश, मायावती ने भी छोड़ दिया साथ

मुश्किल में फंसे अखिलेश, मायावती ने भी छोड़ दिया साथ



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Lucknow. आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर तैयारियों में जुटे राजनीतिक दलों में तमाम तरह के कयासों का दौर चल रहा है। सभी राजनीतिक दल इस कोशिश में लगे हैं कि कैसे वोटों को अपनी ओर मोड़ा जाए, इसे लेकर रणनीतियां भी बनाई जा रही हैं। खासतौर पर गैरभाजपाई दल भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए गठबंधन की योजना बना रहे हैं, लेकिन सभी को यूपी में बीते चुनावों में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठजोड़ की याद आ रही है। ऐसे में कोई भी दल अभी निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है।

लोकसभा चुनावों की जब बात आती है तो सभी राजनीतिक दल उत्तर प्रदेश की ओर रूख कर लेते हैं, क्योंकि पार्टियों को लगता है कि केंद्र का रास्ता यूपी से गुजरता है। दरअसल, यूपी में लोकसभा की सर्वाधिक 80 सीटें हैं। ऐसे में सभी दल इन सीटों पर नजर गड़ाए हुए हैं। जब यूपी का नाम आ ही गया है तो यहां के राजनीतिक दलों की बात न की जाए तो सब कुछ बेकार सा लगता है। यूपी में बहुजन समाजपार्टी और समाजवादी पार्टी बीते 15 सालों से एक के बाद एक सरकार बनी।

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जनता ने भी दोनों दलों काफी सपोर्ट किया, जिसकी भी सरकार बनी, चाहें वह बसपा की हो या सपा की। पूरे समर्थन के साथ सरकारें बनीं, लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद से ही उत्तर प्रदेश में परिवर्तन की बयार बही और भाजपा ने सभी दलों को खोखला करते हुए 80 में 73 सीटों पर कब्जा जमा लिया। जबकि बहुजन समाज पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली।

लोकसभा चुनाव की सुगबुगाहट तेज

माना जा रहा था कि मायावती का परम्परागत दलित वोट भारतीय जनता पार्टी के साथ चला गया था। वहीं, यूपी के 2017 के विधानसभा चुनावों में भी बहुजन समाजपार्टी कोई खास प्रदर्शन नहीं कर पाई और 19 सीटों पर सिमट कर रही गई। वहीं, सपा और कांग्रेस गठबंधन भी धराशाई हो गया। यूपी में भाजपा की सरकार बनने के बाद सूबे में लोकसभा और विधानसभा के उपचुनाव हुए। इन उपचुनावों में कांग्रेस, सपा, बसपा और रालोद ने मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

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इस गठबंधन के बाद यूपी में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद से ही राजनीतिक दलों को लगने लगा कि अगर भाजपा को सत्ता से हटाना है तो गठबंधन जरूरी है। अब लोकसभा चुनाव को लेकर भी सुगबुगाहट तेज हो गई है तो राजनीतिक दलों में गठबंधन की भी चर्चा तेज हो गई है।

इन वजहों से नहीं हो पा रहा गठबंधन

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यूपी में राजनीतिक दलों का गठबंधन आसानी से सम्भव नहीं लग रहा है। माना जा रहा है बसपा प्रमुख मायावती ने शर्त रख दी है कि गठबंधन तभी सम्भव है जब उन्हें सम्मानजनक सीटें मिलें। वहीं, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने तो यहां तक कह दिया है कि यदि गठबंधन को लेकर कुर्बानी देनी पड़े तो भी वह तैयार हैं। हालांकि कांग्रेस की ओर से अभी कोई पुख्ता बयान नहीं है।

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माना जा रहा है कि मायावती को 2019 के चुनाव की फिक्र नहीं है, क्योंकि उनकी नजर 2022 के चुनाव पर है। इसलिए वह गठबंधन से दूर हट रही हैं। बसपा के एक नेता ने बताया कि बसपा को इस बात से डर लग रहा है कि यदि वह सपा और कांग्रेस से गठबंधन कर लेती है तो कहीं उसका परम्परागत वोट भाजपा में न चला जाए। वहीं, अगर गठबंधन हो गया तो 2022 तक वह कैसे उसे बचाये रख सकती हैं। ऐसे में तमाम सवाल हैं जिसकी वजह से मायावती का गठबंधन नहीं हो पा रहा है।

चुनौतियों से जूझ रहे अखिलेश

वहीं, समाजवादी पार्टी इस समय मुसीबत में चल रही है। माना जा रहा है कि सपा को इस समय तीन—तीन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। राजनीतिक पंडितों ने बताया एक ओर भाजपा हमलावर है तो दूसरी ओर सपा से अलग हुए शिवपाल सिंह यादव नेताओं को तोड़ने में लगे। माना जा रहा है कि शिवपाल के अलग मोर्चे के गठन से सपा को बड़ा नुकसान हो सकता है, क्योंकि अखिलेश से नाराज चल रहे नेताओं को शिवपाल अपने खेमे में लाने की कोशिश में हैं। वहीं, गठबंधन को लेकर बसपा की ओर से चुप्पी समाजवादी पार्टी को झटका सबित हो रहा है।

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