पढ़े पूरी रिपोर्ट: फिर वही सवाल, आखिर पीएम पद का दावेदार कौन ...ममता या मायावती

पढ़े पूरी रिपोर्ट: फिर वही सवाल, आखिर पीएम पद का दावेदार कौन …ममता या मायावती



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Lucknow. आगामी लोकसभा चुनाव 2019 को लेकर तैयारियां परवार चढ़ रही है। सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को आगामी लोकसभा चुनाव में मात देने के लिए कांग्रेस समेत कई दल गठबंधन की जुगत में लगे हुए हैं। गठबंधन से पहले एक सवाल जरूर सबके जेहन में उठता है कि आखिर इस गठबंधन का चेहरा कौन बनेगा। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, बहुजन समाज पार्टी की चीफ मायावती या कोई और। खैर जो भी हो, अगर रिपोर्टो की मानें तो ममता और मायावती में मायावती मजबूत दावेदार मानी जा रही हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लंदन दौरे से एक सवाल फिर उठ खड़ा हुआ कि ‘क्या राहुल गांधी खुद को भारत के अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखते हैं? खैर, राहुल गांधी की ओर से जो जवाब आया वो था, फिलहाल मैं इस बारे में नहीं सोच रहा। मैं खुद को एक वैचारिक लड़ाई लड़ने वाले के तौर पर देखता हूं। मुझमें यह बदलाव 2014 के बाद आया। मुझे लगा कि भारत में जैसी घटनाएं हो रही हैं, उससे भारत और भारतीयता को खतरा है। मुझे इससे देश की हिफाजत करनी है। राहुल गांधी ने पहले भी साफ किया था कि संघ या भाजपा को छोड़ कर किसी के भी प्रधानमंत्री बनने पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं है।

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राहुल गांधी के बयान के बाद ही सियासत में ममता बनर्जी और मायावती का नाम आगे आया और अब तो दोनों के बीच ही रेस हो चली है। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे विपक्षी दलों में दोनों के पक्ष में अलग अलग गुटबाजी होने लगी है। 26 जुलाई को एनसीपी नेता शरद पवार ने मायावती से दिल्ली में मुलाकात की और अगले ही दिन यानी 27 जुलाई को जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ममता बनर्जी से कोलकाता में। इन मुलाकातों को 2019 के लिए विपक्ष के संभावित गठबंधन के दो गुटों में बंटते देखा गया। एक धड़ा यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की तरफ झुकता दिखा तो दूसरा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर।

ममता बनर्जी और मायावती के बीच होड़ मच जाने के बाद राहुल गांधी ने पीएम की कुर्सी पर दावेदारी की बजाय लड़ाई को लीड करने का फैसला किया है। राहुल के इस स्टैंड का फायदा है कि विपक्ष जो उनके नाम पर दूरी बना लेता रहा, अब बहाना नहीं बना सकेगा। अगर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ विपक्ष कोई चेहरा घोषित नहीं करता तो जाहिर है सीटों के हिसाब से दावेदारी होगी। अगर कांग्रेस के पास जरूरत भर नंबर आ गया तो अपने आप दावा काबिज हो जाएगा। मायावती और ममता के बीच भी फैसला नंबर के आधार पर ही होगा। राहुल गांधी के लिए फायदे की एक बात ये भी है कि प्रधानमंत्री कम से कम इस बात पर उनके अहंकार को लेकर हमला नहीं करेंगे।

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प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध प्रतिरोध की मजबूत आवाज के तौर पर देखा जाये तो ममता बनर्जी बीस लगती हैं। मोदी सरकार के फैसलों पर विरोध तो मायावती भी जताती रहती हैं, लेकिन उसमें सेलेक्टिव अप्रोच रहता है। ममता का मजबूत विरोध ज्यादातर मसलों पर जोरदार रहता है, लेकिन मायावती के रूख में कुछेक को छोड़ कर रस्मअदायगी ज्यादा लगती है। इसकी एक वजह मायावती पर बीते बरसों में लगे भ्रष्टाचार के आरोप भी हो सकते हैं जिनके बारे में तोते के चाबुक की कहानियां भी चलती रहती हैं। यूपीए के शासन में तो हाल और भी बुरा रहा था।

कभी मायावती तो कभी मुलायम सिंह यादव के सपोर्ट में खड़े रहने की वजह भी यही मानी जाती रही है। वहीं, अगर चुनाव तक एससी-एसटी एक्ट और दलित मुद्दा कायम रहा तो ममता बनर्जी को मायावती पछाड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे – वैसे भी जिस हिसाब से वो बीएसपी के विस्तार में जुटी हैं तस्वीर काफी साफ लग रही है।

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