मायावती के इस कदम से बैकफुट पर ये बड़ी पार्टियां, भाजपा में हड़कम्प

मायावती के इस कदम से बैकफुट पर ये बड़ी पार्टियां, भाजपा में हड़कम्प



Lucknow. आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने अपनी रणनीति में बदलाव करने का फैसला लिया। मायावती ने यह फैसला 2012 से लेकर 2017 के विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद लिया। 2019 के चुनावों को देखते हुए मायावमी ने पार्टी में कुछ परिवर्तन कर नए नेताओं को अहम पदों पर बिठाया। मायावती ने प्रयोग के तौर पर बीते उपचुनावों में समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया। गठबंधन के बाद भाजपा की करारी हार हुई। इसके बाद बसपा को लगा कि गठबंधन से ही भाजपा को मात दी जा सकती है। हालांकि अभी किसी भी दल से मायावती ने गठबंधन के लिए आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती पहले सारे निर्णय खुद लेती थीं, लेकिन तीन 2012, 2014 और 2017 के चुनावों में मिली करारी हार के बाद रणनीतिकारों के साथ मंथन कर फूलपुर, गोरखपुर, कैराना और नूरपुर समाजवादी पार्टी का समर्थन कर सटीक चाल चली, जो कारगर साबित हुई। नतीजा यह हुआ कि भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली और इसी के बाद मायावती ने गठबंधन का ऐलान कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधे चुनौती पेश की तो वहीं अखिलेश यादव और राहुल गांधी को बैकफुट पर ला दिया। जानकारों की मानें, तो बसपा अपने 22 फीसदी वोट के बल पर यूपी के अलावा अन्य राज्यों में सहयोगी दलों से सीटें लेगी तो बदले में यूपी में उन्हें कुछ सीटें देगी।

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आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए बसपा प्रमुख ने संगठन को फिर से खड़ा करने के लिए काम करना शुरू कर दिया। कई कद्दावर नेताओं को पार्टी से बाहर किया तो नए और करीबी नेताओं के बड़े ओहदे पर बैठाया। सत्ताधारी से लेकर अन्य विरोधी दल आपस में उलझते रहे, वहीं मायावती खिसके वोटबैंक को वापस पाने के लिए अंदरखाने कैडर को मजबूत करती रहीं। 2012 में जिन विधायक को टिकट काट कर पार्टी से बाहर किया, उनकी घर वापसी कराई। नसीमुद्दीन को बाहर कर राज्यसभा सांसद सतीश मिश्रा और डॉ. अशोक सिद्धार्थ जैसे नेताओं को अपनी रणनीतिकारों की टीम में जगह दी। इसी के बाद मायावती अपने खास रणनीतिकारों के साथ कैडर को दोबारा खड़ा करनी की रणनीति बनाई तो वहीं यूपी के लोकसभा उपचुनाव में सपा को समर्थन देकर अपनी ताकत परखी। बीजपी की हार के बाद मायावती महगठबंधन के प्लॉन की तरफ कदम बढ़ा दिए और उनके बिना बुलावे पर अखिलेश यादव और राहुल गांधी खुद गठबंधन का हिस्सा बनने की रजामंदी दे दी।

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2014 के आम चुनाव में बसपा को भले ही एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन 4.3 प्रतिशत वोट के साथ वह भाजपा और कांग्रेस के बाद देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। 2009 के आम चुनाव में बसपा को अब तक सबसे ज्यादा 6.17 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। 2014 के आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा को 20 फीसदी वोट मिले थे और 2017 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़ कर 22 प्रतिशत हो गया है। मतलब, मायावती की अगुवाई में बसपा अकेले दम पर बहुत ताकतवर है। जानकारों की कहना है कि सपा, बसपा और कांग्रेस के साथ आने से भाजपा के अंदर जबरदस्त बेचैनी है, क्योंकि अगर ये तीनों दल साथ आ गए तो यूपी की 80 में से 75 सीटें जीतने का सपना भाजपा का अधूरा रह सकता है। क्योंकि मायावती दो चुनावों में सीट चाहे कम ही पाई हो पर उनका वोट प्रतिशत बढ़ा है और सपा, कांग्रेस के साथ आने से यूपी में बड़ा उलटफेर कर सकती हैं।

मायावती के इस मिशन में बड़ी चुनौती दलितों में उभर रहे क्षेत्रीय क्षत्रप भी हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में और उसके बाद से मायावती की सबसे बड़ी मुश्किल भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर बने हुए हैं। गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी चंद्रशेखर के काफी करीब रहे हैं और उस समय वह भी मायावती के विरोध में थे। अचानक जिग्नेश के रुख में हुआ बदलाव मायावती के लिए राहत की बात है। सूत्रों की मानें तो मायावती के एक करीबी नेता हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर, और जिग्नेश मेवाणी के संपर्क में है और लोकसभा चुनाव में तीनों युवा नेता मायावती के साथ चुनावी रैलियों में दिखेंगे। बसपा नेता दयाराम कुरील कहते हैं कि हमें देश से मनुवादी शक्तियों को हटाना है और इसी के चलते सभी राजनीतिक दल एक साथ धीरे-धीरे कर आ रहे हैं और बसपा प्रमुख के नेतृत्व में 2019 का चुनाव लड़ेंगे।

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