केजरीवाल बनाम उपराज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, जानें अहम बिन्दु

केजरीवाल बनाम उपराज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, जानें अहम बिन्दु



New Delhi. केजरीवाल सरकार बनाम उपराज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना अहम फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने मुख्य फैसले में कहा कि चुनी हुई सरकार लोकतंत्र में अहम है, इसलिए मंत्री-परिषद के पास फैसले लेने का अधिकार है। पीठ ने यह भी कहा कि उपराज्यपाल एलजी के पास कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है। बता दें कि दिल्ली सरकार बनाम उप राज्यपाल के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में 11 याचिकाएं दाखिल हुई थीं। 6 दिसंबर 2017 को मामले में पांच जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा था।

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सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच शक्तियों के विभाजन पर इन बिंदुओं को रेखांकित किया है।
उपराज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता के लिए बाध्य हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खास बिन्दु

– उपराज्यपाल के पास स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है।

– उपराज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह एवं सहायता पर कार्य करना होगा या उनके द्वारा किए गए किसी संदर्भ पर राष्ट्रपति द्वारा लिए गए निर्णय को लागू करना होगा।

– केंद्र के पास भूमि, पुलिस और कानून एवं व्यवस्था की कार्यकारी शक्तियों का विशेष अधिकार है।

– दिल्ली सरकार की कार्यकारी शक्तियां दिल्ली विधानसभा की विधायी शक्तियों के साथ सह-विस्तारित हैं।

– मंत्रिपरिषद की कार्यकारी शक्तियां भूमि, पुलिस, कानून-व्यवस्था को छोड़कर राज्य सूची या समवर्ती सूची में आने वाले सभी विषयों को कवर करती हैं।

– यह स्पष्ट है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली को मौजूदा संवैधानिक योजना के तहत राज्य का दर्जा दिया जा सकता है।
दिल्ली के उपराज्यपाल का दर्जा किसी राज्य के राज्यपाल जैसा नहीं है।

– उपराज्यपाल एक सीमित प्रशासक हैं।

– संसद के पास राज्य सूची और समवर्ती सूची के तहत किसी भी मामले पर दिल्ली के लिए कानून बनाने की शक्ति है।

– दिल्ली विधानसभा के पास भी पुलिस, भूमि, कानून-व्यवस्था को छोड़कर बाकी सभी विषयों पर कानून बनाने की शक्ति है।

– राज्य की कार्यकारी कार्रवाई को समवर्ती और राज्य सूची के तहत आने वाले कुछ विषय पर संसद द्वारा बनाए गए कानून के अनुरूप होना चाहिए।

– उपराज्यपाल को दिमाग लगाए बगैर मशीन की तरह कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि मंत्रिपरिषद के हर निर्णय को राष्ट्रपति के पास नहीं भेजा जा सकता।

– उपराज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच वैचारिक मतभेद तार्किक होना चाहिए, सिर्फ बाधा पैदा करने के लिए नहीं होना चाहिए।

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– उपराज्यपाल और मंत्रिपरिषद को चर्चा और संवाद के माध्यम से मतभेद सुलझाने का प्रयास करना चाहिए।

– उपराज्यपाल को अपने मंत्रियों के साथ सामंजस्यपूर्ण तरीके से काम करना चाहिए और उन्हें उनके हर कदम का विरोध नहीं करना चाहिए।

– मंत्रिपरिषद के फैसले पर उपराज्यपाल को सूचित किया जाना चाहिए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इसके लिए उपराज्यपाल की सहमति आवश्यक है।

– हमारा संविधान रचनात्मक है। इसमें तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं है। इसमें अराजकता के लिए कोई जगह नहीं है।

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