अब मायावती ने खेला यह बड़ा दांव, भाजपा में मचा घमासान

अब मायावती ने खेला यह बड़ा दांव, भाजपा में मचा घमासान



Lucknow. भारतीय जनता पार्टी को 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में मिली प्रचंड जीत के बाद यूपी और कर्नाटक में हुए चुनावों में विपक्ष की एकता के आगे हार का सामना करना पड़ा। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग को बसपा और सपा ने ध्वस्त कर दिया है। अब माना जा रहा है कि भाजपा को 2019 में कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है यदि कोई नई रणनीति नहीं बनाई।

2014 के लोकसभा और ​2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान भारतीय जनता को जनता के प्रचंड बहुमत दिया था, तब इस मिले बहुमत को मोदी लहर बताया जा रहा था। 2018 आते—आते मोदी लहर तब ठंडी पड़ गई, जे हाल में हुए कर्नाटक चुनावों में कांग्रेस और जदएस ने सरकार बना ली। हालांकि इसकी शुरुआत यूपी के लोकसभा उपुचनावों से भी मानी जा रही है। दरअसल गोरखपुर और फूलपुर में हुए उपचुनावों में सपा और बसपा के गठजोड़ ने भाजपा का बंटाधार कर दिया। रही सही कसर यूपी के कैराना और नूरपुर में पूरी हो गई। कैराना में रालोेद की प्रत्याशी तबस्सुम हसन ने भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह को भारी बहुमत से हराया। वहीं, नूरपुर में सपा के प्रत्याशी ने जीत हासिल की है। माना जा रहा है कि यह सब सपा और बसपा की सोशल इंजीनियरिंग की वजह से हुआ।

अब सवाल यह उठता है कि क्या भाजपा की सोशल सोशल इंजीनियरिंग सबका साथ सबका विकास फेल हो रही है। जी हां, साफ शब्दों में कहा जा सकता है कि सपा और बसपा की सोशल इंजीनियरिंग भाजपा के लिए घातक साबित हो रही है। तो ऐसे में भाजपा को यूपी में 2019 में बड़ा असर देखने को मिल सकता है। भाजपा के लिए 2019 का इतिहास दोहराना किसी मुश्किल से कम नही होगा।

मायावती ने खेला बड़ा दांव

बसपा सुप्रीमो मायावती को लगातार चुनावों में मिल रही हार के बाद एक बड़ा दांव खेल दिया है, जिससे भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग कमजोर होती दिखाई दे रही है। बसपा का परम्परागत दलित वोट 2014 और 2017 में भाजपा में चला गया था, लेकिन मायावती ने इस बीच दलित और पिछड़ा कार्ड खेल दिया। ओम प्रकाश राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य के बीजेपी में जाने से राजभर और मौर्य वोट बीजेपी की ओर चला गया था, लेकिन मायावती ने इस बीच पार्टी में बड़ बदलाव कर दिया। राम अचल राजभर को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया है। जबकि आरएसएस कुशवाहा को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। मायावती के इस दांव को संसदीय चुनाव 2019 के लिए बड़ा फायदेमंद माना जा रहा है। दोनों जाति के वोटर बीजेपी के साथ चले गये थे, जो अब इन नेताओं के चलते बीएसपी में लौट सकते हैं यदि ऐसा हुआ तो बीजेपी को करारा झटका लगना तय है।

भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग हुई कमजोर

दरअसल प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद से ही सोशल इंजीनियरिंग काफी कमजोर हो गई है। दलित और पिछड़ा वर्ग अपने आप को छला महसूस करने लगा है। माना जा रहा है कि आरएसएस और बीजेपी के नाम पर शासन और प्रशाासन में एक खास तबके की तैनाती हो रही है। इसके अलावा जाति विशेष के नेताओं को कई बड़ी जिम्मेदारी न मिलना। अगर जिम्मेदारी मिल भी गई है तो उन्हें उतनी पावर न देना, जिससे वा अपने समाज के लोगों का भला कर सकें। इन सबके चलते भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग तेजी से कमजोर हो रही है यदि भाजपा ने जल्द ही व्यवस्था में बदलाव नहीं किया तो उपचुनाव के परिणाम संसदीय चुनाव के नतीजे में बदल सकते हैं।

14 साल तक भाजपा चली गई थी सत्ता से बाहर

गौरतलब है कि यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह की सरकार के समय भाजपा पर कई आरोप लगते थे जिसके चलते बीजेपी एक बार सत्ता से बाहर गयी तो 14 साल तक वापसी नहीं हुई। बीजेपी जब सत्ता से बाहर थी तो उस समय सपा व बसपा ही प्रदेश पर शासन करती थी, इसका मुख्य कारण इन दोनोंं दलों की सोशल इंजीनियरिंग मजबूत होना था। बसपा के साथ दलित व पिछड़े वर्ग का बड़ा भाग जुड़ता था और मुस्लिम वोटर भी साथ आते थे तो प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार मिली थी। सपा के साथ यादव व सवर्ण वर्ग के वोटर जुड़ते थे, यहां भी मुस्लिम जुड़ते थे तो प्रदेश की सत्ता पर सपा का कब्जा होता था।

बीजेपी ने संसदीय चुनाव 2014 व 2017 के बाद सोशल इंजीनियरिंग ठीक की थी, जिसके चलते यूपी में प्रचंड जीत मिल थी, लेकिन सीएम योगी आदित्यनाथ से लेकर संघ के नाम पर कुछ नेता खास जाति कार्ड खेल रहे हैं जिसके चलते बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग कमजोर हो गई है जिसका उदाहरण फूलपुर, गोरखपुर के बाद कैराना उपचुनाव में देखना को मिला है और भगवा पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है।


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