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यूपी में शोध का सच!

वस्तुत: उच्च शिक्षा में शोध एक वैज्ञानिक परम्परा का चिंतन है, लेकिन वास्तव में शोध वैज्ञानिक परम्परा से व्यक्तिनिष्ठï परम्परा में तब्दील होती दिखाई देती है। शोध जहां हमारे सोचने समझने की क्षमता का विकास तर्क संगतिकरण और मूल्य तटस्थता जैसे मूल्यों का विकास करती है, लेकिन आज वास्तविकता कुछ और ही है।


वस्तुत: उच्च शिक्षा में शोध एक वैज्ञानिक परम्परा का चिंतन है, लेकिन वास्तव में शोध वैज्ञानिक परम्परा से व्यक्तिनिष्ठï परम्परा में तब्दील होती दिखाई देती है। शोध जहां हमारे सोचने समझने की क्षमता का विकास तर्क संगतिकरण और मूल्य तटस्थता जैसे मूल्यों का विकास करती है, लेकिन आज वास्तविकता कुछ और ही है।

rajnish verma
रजनीश वर्मा

पीएच.डी. यानि डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी, अकादमिक क्षेत्र में सबसे बड़ी डिग्री है। उच्च शिक्षा का दर्शन और इसकी व्यवहारपरकता छात्र-छात्राओं में वंचना को जन्म दे रही है। जब कोई छात्र-छात्रा इंटर पास करके विश्वविद्यालयी शिक्षा की ओर रुख करता है तो विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के बाद जब वह क्लासरूम में पहुंचता है तो एक बार वह भी उच्च शिक्षा के सपनों में खो जाता है। स्नातक, परास्नातक फिर डॉक्टरेट की डिग्री, यूजीसी-नेट/जेआरएफ, सीएसआईआर उसके सपनों के पंखों को हवा देते हैं। पर, जैसे-जैसे वह इन डिग्रियों को ग्रहण करता जाता है फिर उसे उच्च शिक्षा के इस दम्भ से बाहर आना मुश्किल लगता है और वह सापेक्षिक वंचना से ग्रस्त हो जाता है।

राज्य का दर्शन देखें तो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे लोगों की तरफ उनका ध्यान जाता ही नहीं। ऐसा लगता है कि यह उच्च शिक्षित तबका उनके लोक-लुभावने भाषणों, वादों से भलीभांति परिचित है और इसीलिए राजनीतिक दल ऐसे तबकों पर ध्यान देने की बजाय ऐसे लोगों को टारगेट करते हैं, जो उनके रील चरित्र में खोकर अपना रियल चरित्र समर्पित कर देते हैं। राजनीतिक दल इनको बड़े वोट बैंक के रूप में देखता है और राजनीतिक वादे इन्हीं के परिप्रेक्ष्य में दिखाई पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में यह उच्च शिक्षित तबका एक सीमांत व्यक्तित्व में खो जाता है। अपने अस्तित्व को पहचानने के लिए भारतीय समाज की सबसे बड़ी अनिवार्य शर्त है सरकारी नौकरी। वह भी इनके हाथ से परे रहती है, क्योंकि शैक्षणिक संस्थाओं से लेकर सरकार तक गम्भीर नहीं दिखाई देती है और रही-सही कसर यूजीसी पूरी कर देता है।

यूजीसी आए दिन नेट, पीएचडी और शिक्षकों की नियुक्ति से सम्बंधित नियमों को अपनी सुविधानुसार बदलता रहता है। इन नियमों की जटिलता में कोई भी व्यक्ति अपने अस्तित्व को भुला सकता है या वंचित महसूस करता है। नियमों की सरलता और तर्कसंगतता से सम्बंधित गजट सभी लोगों की पहुंच में और बोधगम्य होने चाहिए, जिसको आसानी से समझा जा सके एवं जिसका दुरुपयोग संस्थान अपने प्रायोजन सिद्ध के लिए शिक्षकों, छात्र-छात्राओं को टारगेट न कर सके। जिससे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले लोग और उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र-छात्रा आश्वस्त हों कि उनका शोषण नहीं होगा और वह अपना शोध कार्य गुणवत्तापरक करने में इमानदारी दिखाएंगे।

पीएचडी के बावजूद नहीं बन सकते शिक्षक

वस्तुत: उच्च शिक्षा में शोध एक वैज्ञानिक परम्परा का चिंतन है, लेकिन वास्तव में शोध वैज्ञानिक परम्परा से व्यक्तिनिष्ठï परम्परा में तब्दील होती दिखाई देती है। शोध जहां हमारे सोचने समझने की क्षमता का विकास तर्क संगतिकरण और मूल्य तटस्थता जैसे मूल्यों का विकास करती है, लेकिन आज वास्तविकता कुछ और ही है। तमाम शैक्षिक समस्याओं के चलते भारतीय विश्वविद्यालयों द्वारा बांटी जा रही पीएचडी डिग्रियों का स्तर इतना नीचा है कि किसी भी कॉलेज या विश्वविद्यालय में प्रारंभिक स्तर पर शिक्षकों के रिक्त पद भरने के लिए यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) अपने मानकों में समय-समय पर बदलाव करता रहता है। छात्र ने भले ही पीएचडी कर लिया हो, लेकिन यूजीसी शिक्षकों की अनिवार्य योग्यता का संपूर्ण मापदंड नहीं मानता है। लिहाजा शिक्षक बनने के लिए नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (नेट) या स्टेट लेवल एलिजिबिलिटी टेस्ट (स्लेट) पास करना अनिवार्य है।

 

बिना लैब के कैसे शोध करें छात्र

दरअसल, भारत का उच्च शिक्षा तंत्र हर स्तर पर चरमराया हुआ है, स्नातक से लेकर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों तक, सभी पाठ्यक्रमों में एक जैसे ही हालात हैं। विडम्बना यह है कि जिसके पास जो डिग्री है, वह उस डिग्री से संबंधित नौकरी के ही लायक नहीं है। देश में ऐसे हजारों स्नातक हैं जो बेरोजगार ही रह जाते हैं। अनुपयोगी पीएचडी डिग्रियां तो भारतीय उच्च शिक्षा तंत्र पर ही सवालिया निशान लगाती हैं। वहीं, सरकारें पीएचडी करवाने वाले संस्थानों में शोध संसाधनों (लैब, पुस्तकालय आदि) और छात्रों को अच्छा माहौल सुनिश्चित नहीं करा पा रही हैं।

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केंद्र और प्रदेश सरकारें उच्च शिक्षा में गुणवत्तापरक शिक्षा को लेकर आए दिन दावे और वादे करती है, लेकिन प्रदेश के तमाम विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इन्फ्रास्ट्रक्चर ही नहीं है। जो छात्र शोध कर रहे हैं उनके प्रैक्टिकल के लिए लैब ही नहीं हैं, तो ऐसे में गुणवत्तापरक शोध की बात करना बेमानी साबित होगा। अभी हाल ही में प्रदेश की राजधानी लखनऊ के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी के छात्रों ने लैब न होने का आरोप लगाया था। छात्रों का कहना था कि जब लैब ही नहीं होगी तो हम लोग शोध कहां से करेंगे। छात्रों ने बताया कि पहले सीएसआईआर इंस्टिट्यूट में रिसर्च करते थे, लेकिन अब सीएसआईआर ने लैब देने से मना कर दिया है।

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सीएसआईआर का कहना है कि जब एमओयू हो जाएगा तभी हम छात्रों को लैब प्रोवाइड कराएंगे। यह तो सिर्फ बानगी है प्रदेश में तमाम ऐसे में कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं जहां छात्रों को प्रैक्टिकल करने के लिए लैब ही नहीं है। यदि लैब है तो इंस्ट्रूमेंट इतने पुराने हो गए हैं कि वो काम ही नहीं कर रहे हैं। इन तमाम समस्याओं के बीच छात्रों को शोध करना पड़ता है। अब ऐसे में आप ही समझ सकते हैं कि शोध की गुणवत्ता क्या होगी? तो कैसे उम्मीद करें कि सरकारें राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक उच्च शिक्षा सुधार लागू कर सकती हैं?

दोहरे मापदंड अपना रहे विश्वविद्यालय

एक शोध छात्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मैंने यूजीसी नेट और पीएचडी की डिग्री तो हासिल कर ली है, लेकिन जब असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए आवेदन करता हूं तो उसके लिए 55 फीसदी अंक मांगें जाते हैं। छात्र ने बताया कि जबकि मैं आरक्षित श्रेणी से हूं। ग्रेजुएशन में पचास फीसदी नम्बर नहीं, जिस वजह से मुझे वैकेंसी से डिबार कर दिया जाता है।
इसके अलावा छात्र ने बताया कि जैसे कानपुर विश्वविद्यालय में 45 प्रतिशत पर सेंकेड डिवीजन मिलता है जबकि लखनऊ विश्वविद्यालय 48 प्रतिशत पर सेकेंड डिवीजन देता है। यदि कोई छात्र लखनऊ विश्वविद्यालय से 46 फीसदी और कोई कानपुर विश्वविद्यालय से 46 फीसदी अंक पाता है तो एक विश्वविद्यालय द्वितीय श्रेणी और एक तृतीय श्रेणी की डिग्री देता है, जबकि अंक समान है। ऐसी स्थिति में यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नियम के अनुसार एक जगह वह गुड एकेडमिक रिकॉर्ड में शामिल हो जाता है जबकि दूसरी जगह पर बाहर कर दिया जाता है। ऐसी विसंगतियों पर यूजीसी को विशेष ध्यान देने की जरूरत है, जिससे शोध छात्रों को सफर करना न पड़े।

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यही नहीं, कुछ ऐसी ही स्थितियां मानव शास्त्र और समाज शास्त्र को लेकर भी हैं। छात्र ने बताया कि यदि कोई शोध छात्र इन उपर्युक्त विषयों में से किसी एक विषय से पीएचडी करता है और उसका चयन विवि में होता है तो यूजीसी को ऐसे स्पष्ट निर्देश बनाने चाहिए कि मानव शास्त्र का छात्र मानव शास्त्र में और समाज शास्त्र का समाज शास्त्र में नियोजित किया जाएगा। यदि मानव शास्त्र का समाज शास्त्र में समाज शास्त्र का मानव शास्त्र में निुयक्त होता है तो इस पर भी स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करने चाहिए, जिससे सेवा में आने के बाद ऐसे अभ्यर्थियों को संस्थानों की लापरवाही का शिकार न होना पड़े।

पीएचडी की प्रवेश प्रक्रिया में देरी

यही नहीं, तमाम छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालयों द्वारा पीएचडी के लिए प्रवेश परीक्षा तो करा ली जाती है, लेकिन दो-दो साल हो गए हैं, अभी तक प्रवेश नहीं हो सका है। तमाम ऐसे भी छात्र हैं जो यूजीसी नेट, जेआरफ परीक्षा तो उत्तीर्ण कर चुके हैं, लेकिन पीएचडी में अभी तक प्रवेश न हो पाने के कारण उनकी फेलोशिप अधर में लटकी दिखाई पड़ रही है। एक छात्र अरुन शेखर ने बताया कि मैंने राज्य के एक विश्वविद्यालय से जुलाई, 2017 में पीएच.डी. में प्रवेश के लिए आवेदन किया था, लेकिन अभी तक प्रवेश प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, जिससे मेरी फेलोशिप की अवधि अब समाप्त हो चुकी है। अब शोध में प्रवेश लेने के बाद फेलोशिप मिलेगी या नहीं इस पर संशय बना हुआ है।

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उदाहरण के तौर पर आपको बता दें कि महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय बरेली में शैक्षिक सत्र 2018-19 में स्नातक की दाखिला प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन सत्र 2017-18 में शुरू हुई पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया अभी अधर में अटकी है। जबकि पीएचडी में प्रवेश परीक्षा का रिजल्ट जारी हुए करीब दो माह बीत चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि छात्रों के भविष्य का क्या होगा?

शोध के नाम पर छात्रों का शोषण

प्रदेश में लगभग 15 विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के पंखों को हवा दे रहे हैं। अब सवाल यह है कि इन उच्च शिक्षित छात्र-छात्राओं का शिक्षा के दौरान और शिक्षा के बाद का जीवन शोषण विमुक्त होगा, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। आए दिन अखबारों की सुर्खियों में गाइडस के चर्चे दिखाई देते हैं कि जहां छात्र उनके घरेलू कामों में व्यस्त हैं, तो लड़कियां यौन शोषण का आरोप लगा रही हैं। हम आपको ऐसे ही कुछ केस के बारे में बताएंगे जो हाल ही में अखबारों की सुर्खियां बने रहे।

केस -1 : प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बाबा साहब भीम राव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में एमसीए के टॉपर रहे पीएचडी छात्र रामेन्द्र नरेश ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों गोल्ड मेडल लेने से इनकार कर दिया था। छात्र का कहना था कि वह विश्वविद्यालयों में दलित उत्पीडऩ से परेशान है, इस कारण राष्ट्रपति से मेडल नहीं लेना चाहता। यही नहीं, इसी विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे कई स्कॉलर्स का आरोप था कि उन्हें लगातार मानसिक प्रताडऩा झेलनी पड़ रही है। होम साइंस में पीएचडी कर रहीं तीन छात्रों ने डिपार्टमेंट की एक प्रोफेसर पर फाइनल थीसिस नहीं सबमिट करने का आरोप लगाया था, जिस वजह से उनकी पीएचडी नहीं पूरी हो पा रही थी। तीनों छात्राएं साल 2011 बैच की थीं।

केस -2 : मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही एक छात्रा ने अपने हॉस्टल की वॉर्डन पर शोषण का आरोप लगाया था। छात्रा ने कमिश्नर को पत्र लिखा था, जिसमें चीफ वॉर्डन पर उसके साथ अशोभनीय हरकतें और अभद्र भाषा का प्रयोग करने का आरोप लगाया था। वहीं, चीफ वॉर्डन ने आरोपों को बेबुनियाद बताया था।

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केस-3 : बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की शोध छात्रा ने प्रोफेसर पर शादी का झांसा देकर पांच साल से शारीरिक शोषण करने का आरोप लगाया था। पीडि़त छात्रा ने आरोपी प्रोफेसर के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

केस-4 : भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर में हरियाणा के फरीदाबाद निवासी छात्र भीम सिंह मैकेनिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी कर रहा था। बीते दिनों छात्र ने हॉस्टल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। हालांकि आत्महत्या का कारण अभी स्पष्ट नहीं हो सका। साथी छात्रों ने बताया था कि वह आजकल बहुत तनाव में रहता था।

ये तो केस सिर्फ बानगी भर हैं, अगर पूरे देश की बात की जाए तमाम ऐसे मामले मिल जाएंगे, जहां शोध छात्र-छात्राओं का लगातार शोषण किया जा रहा है। अगर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की ही बात की जाए तो बीते माह 16 मार्च को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में एमफिल-पीएचडी की नौ छात्राओं ने वसंतकुंज थाने में प्रोफेसर अतुल जौहरी के खिलाफ केस दर्ज कराया था। छात्राओं ने प्रिंसिपल पर शोषण करने का आरोप लगाया था। वहीं, प्रोफेसर ने आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए पीएचडी लाइफ साइंस के एचओडी पद से इस्तीफा दे दिया था। जौहरी ने कहा था, जिन छात्राओं ने मेरे खिलाफ केस दर्ज कराया है, उनकी अटेंडेंस कम है। इसलिए कार्रवाई से बचने के लिए वे इस तरह के आरोप लगा रही हैं।

वहीं, दिल्ली के ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की शोध छात्रा मंजुला देवक ने कैम्पस में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली थी। पुलिस को उसका शव कैम्पस के एक अपार्टमेंट में मिला था। छात्रा शादीशुदा थी। बताया जा रहा था कि परिवारिक कारणों से छात्रा ने खुदकुशी की है। हालांकि मंजुला ने खुदकुशी किस वजह से की, इसका फिलहाल पता नहीं चल सका था।

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इसके अलावा एम्स में माइक्रोबॉयोलॉजी विभाग से जयपुर निवासी छात्र रजत प्रकाश पीएचडी कर रहा था। रजत प्रकाश ने अपने कमरे में बंद होकर दवाओं की ओवरडोज ले ली थी, रजत ने इस बावत एक पत्र भी एम्स के निदेशक को सौंपा था। उसने लिखा था कि उसका काफी मानसिक शोषण किया जा रहा है। एम्स के प्रोफेसर कर्मचारियों को अपने निजी कार्यों में लगाते हैं, जबकि मरीज से जुड़े कार्यों की जिम्मेदारी छात्रों को देते हैं।

वहीं, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर किरण कुमार पर पीएचडी की एक छात्रा ने शादी का झांसा देकर शोषण करने का आरोप लगाया। प्रोफेसर पर आरोप है कि पीएचडी कर रही छात्रा से शादी करने का वादा किया था, लेकिन बाद में दूसरी महिला से शादी कर ली। छात्रा ने प्रोफेसर के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी थी।

शोध की कठिन डगर पर सहूलियतें बढ़ाने की दरकार

एक शोध विशेषज्ञ ने बताया कि शोध को लेकर सबसे अधिक भ्रम की स्थिति स्वयं (यूजीसी) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने पैदा की है। यूजीसी के तमाम दिशा निर्देशों के बावजूद विश्वविद्यालय पीएडी को लेकर अपने-अपने नियम निर्देश लागू कर रहे हैं। इसी कारण पीएचडी की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि यूजीसी पीएचडी को लेकर कोई ठोस और व्यापक नियम बनाए, जिसे सभी विश्वविद्यालयों में एक साथ प्रभावी रूप से लागू किया जा सके। इसके साथ ही पीएचडी को अध्यापन योग्यता मानने को लेकर बार-बार पैदा हो रही भ्रम की स्थिति को यूजीसी को ही साफ करना होगा, अन्यथा पीएचडी की गुणवत्ता सुधारी नहीं जा सकेगी। शोध के दौरान शोधार्थियों से भेदभाव, शोषण जैसी घटनाओं को रोकने के लिए भी एक सजग निगरानी तंत्र बनाए जाने की जरूरत है।


असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए न्यूनतम अर्हता को लेकर यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) समय-समय पर बदलाव करती रहती है। दिसम्बर 1992 से पहले जिन लोगों ने पीएच.डी. उपाधि धारित की थी उनको यूजीसी ने नेट की परीक्षा से छूट प्रदान की थी, जिसकी समयावधि यूजीसी ने बढ़ाकर दिसम्बर 2002 की इसके बाद फिर जून 2009 कर दी। अब जून 2009 से पहले पीएचडी करने वाले छात्रों को नेट की परीक्षा से छूट प्रदान की गई। मेरा मानना है कि यूजीसी को एक समान नियम कानून बनाने चाहिए। नेट की परीक्षा देने की अर्हताएं और नियुक्ति की अर्हताओं में समानता होनी चाहिए, जिससे दोहरे मानकों के परिणाम छात्र-छात्राओं और शिक्षकों पर न पड़े और वह इस क्षेत्र में आगे बढऩे से पहले दस बार सोचने के लिए मजबूर न हों।

डॉ. गोविंद जी पांडेय, प्रोफेसर

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ


फेलोशिप शोध छात्र-छात्राओं को अपने शोध अध्ययन को उत्कृष्ट और गुणवत्तापरक बनाने के लिए होती है, लेकिन फेलोशिप को लेकर आज शोध छात्रों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जैसे कि कागजी कार्रवाई बहुत है कई जगह अनावश्यक हस्ताक्षर करवाने पड़ते हैं। जिससे वेवजह की भागदौड़ करनी पड़ती है। फेलोशिप प्रदान करने वाली संस्थाएं बहुत बिलम्ब से राशि का भुगतान करती है, जिससे छात्रों को काफी मानसिक तनाव सहन करना पड़ता है।

हरिनंदन कुशवाहा, शोध छात्र

लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ


पीएचडी के बाद सबसे ज्यादा चिंताजनक बात है इंटर डिसिपलनिरी सिस्टम। मैंने इंडस्ट्रियल केमेस्ट्री से एमएससी की है और इसी से पीएचडी कर रहा हूं। जब यूजीसी नेट के लिए परीक्षा देता हूं तो केमेस्ट्री में देता हूं। नौकरी के लिए भी केमेस्ट्री में आवेदन करता हूं, लेकिन जब नौकरी की बात आती है तो वहां से यह कहकर भगा दिया जाता है कि तुम इंडस्ट्रियल केमेस्ट्री से हो, तो ऐसे में हम लोग कहां जाएं। इसके अलावा फेलोशिप को लेकर कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। केंद्रीय विश्वविद्यालय में नॉन नेट और नेट दोनों शोधार्थी को लगभग आठ हजार रुपए स्कॉलरशिप मिलती है, जो काफी कम है। ऐसे में हम लोगों को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

अजय कुमार, शोधार्थी, 
बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ


हाल ही में यूजीसी ने लगभग 4000 जनरल को अपनी सूची से बाहर कर दिया है, ऐसी स्थिति में छात्रों के आगे एक सवाल पैदा हो गया है कि यदि इनमें उनके शोध पत्र छपे हैं तो क्या वह मान्य होंगे। छात्रों को अकादमिक रूप में इसका लाभ मिलेगा या नहीं, यूजीसी ने यह स्पष्ट नहीं किया है।

डॉ. अमित कुमार, पोस्ट डॉक्टोरल फेलो
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी


शोध के दौरान जो हमें फेलोशिप दी जा रही है वो काफी लेट-लतीफ मिलती है, जिससे आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हम लोगों को नवम्बर से अब तक फेलोशिप नहीं मिली है। इसके अलावा यूजीसी के नियमों के चलते रिसर्च के बाद भविष्य को लेकर भी चिंता बनी हुई है। आर्ट के विषयों को लेकर ज्यादा दिक्कत होती है।

मनीष जैसल, शोधार्थी
महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा, महाराष्ट्र


यूजीसी की गाइडलाइन के अनुसार पीएचडी में प्रवेश के लिए परीक्षा कराई जाती है। परीक्षा में 50 फीसदी रिसर्च मैथेडोलॉजी और 50 फीसदी विषय से सम्बंधित प्रश्न होने चाहिए। दोनों पेपरों में पचास फीसदी नम्बर आने के बाद छात्रों को इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता है, लेकिन यूनिवर्सिटी इन नियमों को लागू नहीं करती है, जिससे छात्रों को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

जय सिंह, शोधार्थी 

बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ


मैंने राज्य के एक विश्वविद्यालय में 2017 जुलाई में पीएडी प्रवेश के लिए आवेदन किया था, लेकिन अभी तक प्रवेश प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, जिससे मेरी फेलोशिप की अवधि अब समाप्त हो चुकी है। अब पीएचडी में प्रवेश लेने के बाद फेलोशिप मिलेगी या नहीं अभी संशय बना हुआ है।

अरुन शेखर, छात्र


शोध छात्र को फेलोशिप को लेकर कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जेआरएफ को फेलोशिप दी जाती है और जो जेआरएफ नहीं है उन्हें कोई फेलोशिप नहीं मिलती है। हालांकि रिसर्च के लिए कई फंडिंग एजेंसियां है, लेकिन उनकी प्रक्रिया जटिल होने के कारण छात्रों को फेलोशिप नहीं मिल पाती है। जिससे गुणवत्तापरक शोध की कल्पना नहीं की जा सकती है। मेरा मानना है जब सरकारें विधायकों और सांसदों को भत्ता दे सकती हैं तो छात्रों को क्यों नहीं। अगर सरकार शोध छात्रों के लिए फंड की व्यवस्था कर दे तो छात्र आसानी से अपना शोध कार्य पूरा कर सकेंगे। यही नहीं, कॉलेजों में लैब न होने के कारण हम लोगों को तमाम समस्याएं झेलनी पड़ती हैं।

दयाशंकर वर्मा, शोध छात्र
डीएवी कॉलेज, कानपुर


गुणवत्तापरक शोध के लिए काफी पैसों की जरूरत होती है, ऐसे में सरकार को जेआरएफ की तरह पीएचडी कर रहे सभी छात्रों को फेलोशिप देनी चाहिए, जिससे शोध के दौरान छात्रों को आर्थिक समस्याओं का सामना न करना पड़े। छात्रों को रिसर्च के लिए तमाम जगहों पर जाना पड़ता है, लेकिन पैसा आड़े आ जाता है, जिससे शोध कार्य समय से पूरा नहीं हो पाता है।

सत्यपाल वर्मा,  शोध छात्र, गांधी फैज-ए-आम पीजी कॉलेज, शाहजहांपुर

(सम्बद्घ महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली)


शोध के दौरान प्रारंभिक चुनौती विषय चयन को लेकर है। विभागीय व शोध निर्देशक का अपेक्षित सहयोग न मिलने से शोधार्थी विषय चयन में परेशान रहते हैं। अधिकांश शोध निर्देशक अपनी रुचि या अपने किसी सगे संबंधियों के ऊपर ही शोध करवाने का प्रयास करते हैं। जिससे शोधार्थी अपनी रुचि के अनुसार विषय चयन नहीं कर पाता है। समय पर शोधवृत्ति न मिलने से इसका असर शोध पर स्पष्ट दिखाई देता है। शोध पुनरावृत्ति (कॉपी पेस्ट) का चलन बढऩे से शोध की गुणवत्ता पर सवालिया निशान लग रहा है। इससे एक अच्छा शोधार्थी भी परेशान होता है। बहुजन समाज या वंचित तबके के शोधार्थियों का पीएच.डी. प्री-सबमिशन होने के बाद फाइनल साक्षात्कार बहुत देर से करवाने का चलन बढ़ रहा है, जिससे उनकी शोध गुणवत्ता प्रभावित होती है।

रजनीश कुमार अम्बेडकर 

शोध छात्र, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र


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