हाथ नहीं तो क्या पैरों से भी चलती है जिंदगी

हाथ नहीं तो क्या पैरों से भी चलती है जिंदगी



लखनऊ। हौसला मत खोना गिरकर ऐ मुसाफिर, ठोकरें ही इंसान को चलना सिखाती हैं। पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है मेरे दोस्त, क्योंकि तकदीर उनकी भी होती है, जिनके हाथ नहीं होते। इसे सच साबित कर दिखाया है देवरिया जिले के बरियारपुर गांव टोला रघुनाथपुर पोस्ट बढऱा बाबू के रोहित विश्वकर्मा ने।

बचपन से ही दोनों हाथ गंवा चुके रोहित विश्वकर्मा कम्प्यूटर पर अच्छे से काम कर लेते हैं। उसके हौंसले को देखकर कोई भी दंग रह सकता है। रोहित अपने पैरों से कलम थाम कर लिख सकते हैं और कम्प्यूटर भी चलाते हैं। सिर्फ यही नहीं टाइपिंग स्पीड भी लगभग 40 शब्द प्रतिमिनट है। रोहित द्वारा पैरों से लिखी लिखावट भी काफी स्पष्ट व मोतियों जैसी झलकती है।

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रोहित विश्वकर्मा ने बताया कि बचपन में दूसरे बच्चों को पढ़ते-लिखते देख मन में पढ़ाई करने का दृढ़ निश्चय किया। हाथों की जगह पैरों से कलम थामने में पहले-पहले काफी परेशानी हुई, लेकिन उसके बाद पढऩे की ललक और पिता राम कैलाश विश्वकर्मा द्वारा किए गए प्रोत्साहन से रोहित ने न केवल मैट्रिक, इंटर बल्कि स्नातक की परीक्षा में अच्छे अंकों के साथ सफलता हासिल की। इसी बुलंद हौसले के कारण अब रोहित बैंकिंग की तैयारी कर रहे हैं। रोहित को अफसोस सिर्फ इस बात है कि सरकारी मानदंडों के अनुसार शतप्रतिशत विकलांगता होने के कारण सरकारी नौकरी के लिए जो आवेदन करते हैं, वो निरस्त कर दिया जाता है।

इसके बावजूद रोहित कहते हैं हौसला मत खोना गिरकर ए मुसाफिर, ठोकरें ही इंसान को चलना सिखाती हैं। रोहित का सपना है कि वह बैंकिंग सेक्टर में जाकर लोगों की सेवा कर सकें। रोहित ने बताया कि उनका एक छोटा भाई है, जो पढ़ाई करता है और पिता मजदूरी करते हैं। रोहित के सपनों को उड़ान देने के लिए कोचिंग संचालक सर्वेश दीक्षित चार सालों से मुफ्त में बैंकिंग की तैयारी करा रहे हैं। सर्वेश ने बताया कि रोहित के हौसलों को देख मेरे होश दंग रह गए थे कि पैर से लिखना और कम्प्यूटर चलाना बिल्कुल अद्भुत था। यही वजह है कि रोहित की मदद उन्हें न केवल जरूरी लगी बल्कि उससे हरदम एक सुकून महसूस करता हूं।

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